मेरा गाँव मेरा तीर्थ Cover Image

बर्तन मांजणे री ठेठ देशी विधि अपणाओ
साफ सुथरा चमकीला बर्तन पाओ
चूल्हा री राख अर बाळू रेत सूँ
ठीकरा चोखा मांजिजै है सा आपणा बुढा बडेरा भी आ स्कीम ही काम म लेवता हा जिको सौ साल री स्वस्थ उम्र पावता।
अर आज री नयोड़ी पीढ़ी तो डीटरजेन्ट साबण लावै जिको नतीजो देख ल्यो सफाखानै म भीड़ लाग री है
ज्यूँ पाणी बिजली रो बिल आवै हर महीने इया ही हर महीने सफाखानै रो बिल आबा लागगो है शरीर बीमार होवण लागगो है ।
म्हूँ तो म्हारे आज भी म्हारी माटी सूँ बर्तन मांजू हूँ

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जँवाई जी गिया सासरै सासु दी जुँआरी ।
घरा ल्याया बिंदणी आँगण काडे बुआरी ।।
काड बुआरी बिंदणी घर ने दियो चमकाय ।
देख बिंदणी रा संस्कार सासु मन हरसाय।।
#Rajasthan

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बै दीनडा जाता रैह्या
अब लागो पैसा रो लोभ रे
भाई भाई ने बेरी समझें
ऐ कुलयुग री बातां रें

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#rajasthan #camel #tourism #fairs
आज बड़े दिनों बाद कुछ संख्या में एक साथ अनेकों ऊंठ(रेगिस्तान के जहाज़)देखें।कुछ देर के लिए मैं अपने आप से दूर कुछ वर्षों पूर्व वापिस चला गया था।बात उस दौर की हैं जो दौर दो वक़्त की रोटी के जुगाड़ का हुआ करता था।उस दौर में समय तो सबके पास था किन्तु संसाधन पैसा या यूं कहें की टेक्नोलोजी नाम के यन्त्र हमारे आसपास नहीं दिखाई दिया करते थे।

कुछ जगहों पर निशान गाड़ी या गट्टू हुआ करते थे। वो भी धन्नो सेठ या साहूकार लोगों के पास एंटर गाड़ी मुश्किल से हुआ करती थी।आजीविका के साधन भेड़,बकरी,घाय,ऊंट और ऊंट गाड़ी हुआ करती थी।ब्याह शादी से लेकर बारात में आना जाना किसी दूसरे गांव आना जाना,समान लाना ले जाना हर जगह पशु काम में लिए जाते थे।खेत की जुताई से लेकर पुराने बेरों से पानी निकालने तक ऊंट का प्रयोग किया जाता था।

गांव की पुरानी पानी पीने की टंकी के पास एक प्राकृतिक नाड़ी हुआ करती थी जिसमें हमेशा पानी भरा रहता था। वहां संध्या के समय गांव के ऊंट और ऊंठनिया झाल की हरी पत्तियां,खेजड़ी की लूख खाकर अपनी मस्ती में मुंह से खीज़ करते तो आसपास गरजन की आवाज़ भद्रव की बिजली से भी कड़ाकेदार हुआ करती थी।पशुओं को पशुपालक आलम मेला धोरीमन्ना बेचने या लेने के लिए जाया करते थे।आलम मेला बाड़मेर का एक प्रसिद्ध मेला हैं।इसी दर्श का सांचोर पशु मेला तिलवाड़ा पशु मेला भी फेमस हुआ करते थे।वहां से लंबी कतारों में पशुपालक उंठों को गांव की ओर लाया करते थे जो गांव के बीचो बीच उस दौर का माहौल भी एक अलग हुआ करता था।

ऊंटनी का दूध बड़े भगोने या जंगे में पीना और उसकी गोग को होठों पर से उतारना एक लाज़वाब कला की महारथ मिला करती थी।धीरे धीरे सरकार द्वारा रोक लगाना मेलों में आने जाने में कमी होना पशु पालन कम होना और लोगों की दिलचस्पी कम हो जाना संस्कृति के विलुप्त होने के साथ-साथ आजीविका का ज़रिया और आने वाले दिनों में ऊंट जैसे पशुओं को विलुप्त प्रणाली में ही देखा जा सकेगा। बस समय समय की बात है......

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मासूम राही थार का!
दस दिन हुए हैं मुझे इस जमाने में आये हुए!
थार की जिंदगी बहुत कठिन है मित्रों आज सुबह से 30km चल चुका हूँ!माँ के पीछे पीछे भाग ही रहा हूँ! माँ रोहिड़े के फूल खाने रूक जाती है तो मैं भी दूध पी लेता हूँ! पर चल रहा हूँ बस अंधेरा होने तक मालिक को घर पहुचना है! आजकल पहले वाली अपणायत रही कोनी वरना तो बीच के गाँव में हथाई करने रूकते थे मालिक! #rajasthan #village #camel #thar

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About

मेरा गाँव मेरा तीर्थ है।