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सचमुच, तुम 'महाप्राण' थे 🙏

यूरुप में लड़ाई खत्म होने पर भारत में महामारी फैली। सुर्जकुमार को तार मिला—तुम्हारी स्त्री सख्त बीमार है, फौरन आओ। सुर्जकुमार ने तुरन्त डलमऊ के लिए कूच किया। राम-राम करते जब ससुराल पहुँचे, तब मालूम हुआ, मनोहरादेवी पहले ही चिता में जल चुकी हैं। फेफडे़ कफ़ से जकड़ गये थे। डाक्टर ने पानी की जगह यखनो पिलाने को कहा था। पर यखनो पीना तो दूर, मनोहरादेवी ने अंग्रेजी़ दवा पीने से भी इन्कार कर दिया। कहा— दस बार नहीं मरना है; कौन धरम बिगाड़े? बड़े भाई बदलूप्रसाद उन्हें देखने आए पर खुद ही बीमार हो गए। सुर्जकुमार के पहुँचने से पहले ही वह गढा़कोला चले गये थे। डलमऊ में और उसके आस-पास इतने लोग मरे कि उनकी लाशें फूँकना असम्भव हो गया। गंगा के घाटों पर लाशों के ठट लगे थे। लाशें फूलकर धीरे- धीरे नदी के दोनों किनारों की तरफ़ बहती थीं बीच में थोडी़-सी धारा दिखाई देती थी। लोग कहते थे, लाशों के सड़ने से गंगा का निर्मल जल भी अशुद्ध हो गया है, डाक्टरों ने जाँच करके देखा है, सेर भर पानी में आध पाव सड़ा मांस निकलता है।

चार साल के रामकृष्ण, साल-भर की सरोज—दोनों सन्तानों को वहीं उनकी नानी के पास छोड़कर सुर्जकुमार अपने गाँव चले। अभी गाँव पहुँचे न थे कि देखा, लोग बडे़ भाई बदलू की लाश लिये चले आ रहे हैं। सुर्जकुमार को चक्कर आ गया। राह में वहीं सिर पकड़कर बैठ गये। किसी तरह घर पहुँचे तो देखा, भौजाई बीमार हैं। उन्होंने पूछा, “तुम्हारे दादा को कितनी दूर ले गये होंगे?” सुर्जकुमार से कुछ जवाब देते न बन पड़ा। काका रामलाल भी बीमार थे, भतीजे को देखकर बोले, “तू यहाँ क्यों आया?” सुर्जकुमार ने कहा, “आप अच्छे हो जाएँ तो सबको लेकर बंगाल चलूँ।” बदलूप्रसाद के पाँच बच्चे थे—चार लड़के और एक दूध-पीती बच्ची। बडा़ लड़का महिषादल में सुर्जकुमार के साथ रहता था, बाकी तीन गाँव में थे। बडे़ भाई के देहान्त के तीसरे दिन भाभी भी गुजर गई।

दूध-पीती बच्ची अकेली रह गई। सुर्जकुमार रात को उसे अपने पास लिटाकर सोये। घर में बिल्ली उछल-कूद मचाये थी। सुर्जकुमार को नींद न आई। सबेरे उठकर देखा तो खाट पर लेटी बच्ची का शरीर ठंढा था। सुर्जकुमार ने बच्ची का शव उठाया। उसे नदी किनारे ले गये। गड्ढा खोद कर उसे गाड़ा, फिर घर लौटे। इसके बाद काका रामलाल का देहान्त हुआ। बदलूप्रसाद के लड़के बीमार हुए पर सौभाग्य से अच्छे हो गए।

मृत्यु-लीला समाप्त हुई। परिवार में रह गए सुर्जकुमार और उनके चचेरे भतीजे; पुत्र और कन्या ननिहाल में थे। ज़िन्दगी का यह दौर एक भयानक सपने जैसा था। सारा कुनबा ही उजड़ गया। अब सर पर किसी का साया नहीं। रामसहाय - रामलाल की पीढ़ी तो खत्म हो ही गई, बदलू-सुर्जकुमार की पीढी़ में भी अकेले सुर्जकुमार रह गये। एक आदमी की कमाई से इतने बच्चों का खर्च कैसे चलेगा? इतनी मौतें एक साथ देखकर कोई अपने औसान कैसे कायम रखे? कोई ऐसी पाठशाला नहीं जहाँ ऐसी परिस्थिति का सामना करने की शिक्षा आदमी को पहले से दी जा सके। फिर सुर्जकुमार के दिन लाड़-प्यार में बीते थे। ज़िन्दगी के बीस साल निश्चिन्त बिताने के बाद सर पर यह आफ़त का पहाड़ ही टूट पड़ा।

सबसे बड़ा धक्का लगा, मनोहरादेवी के गुज़र जाने का। उनके विवाहित जीवन की शुरूआत अब होनी चाहिए थी पर शुरू होने के बदले उसका अन्त हो गया। मनोहरादेवी के जीवित रहते उन्होंने उनकी कद्र न की। गवहीं के दिनों उनके बालों को लेकर ताने कसे। गोश्त खाने के पीछे गढा़कोला में अपने साथ रहना दूभर कर दिया। अपने निठल्लेपन के कारण एन्ट्रेन्स परीक्षा पास न कर पाए, इससे अपने साथ उन्हें भी अपमानित कराके घर से निकले। पर वह कितनी उदार थीं! कभी पति या ससुर के रूखे व्यवहार की शिकायत न की। कितनी कम उम्र में संसार छोड़ गईं! अभी अठारह की भी तो न थीं। कैसा सुन्दर कंठ, कैसा मृदुल स्वभाव, कैसा सात्त्विक सौन्दर्य, सुर्जकुमार ने देखा, उनके हृदय में पत्नी के लिए अगाध प्यार है। यह प्यार अब तक क्यों न दिखाई दिया था? किस मोह ने उनकी आँखों पर पर्दा डाल दिया था? क्या मृत्यु ही यह पर्दा उठा सकती थी कि वह मनोहरादेवी की वास्तविक छवि देखें?

सुर्जकुमार गढा़कोला से डलमऊ गए। गंगा के किनारे रात-रात भर वह श्मशान में घूमा करते जहाँ मनोहरादेवी की चिता जली थी। दिन में वह अवधूत टीले पर बैठ जाते और गंगा में बहती हुई लाशें देखा करते। पत्नी और भाई के निधन के बाद अब मृत्यु का ऐसा कोई दृश्य न था जिससे सुर्जकुमार को भय होता। जीवन में जो सबसे बीभत्स और भयानक है, उसे भर आँखों देखना वह सीख गए थे।


यह पढ़कर मन सिहरा जाता है। यह सब के बाद भी बाकी था पुत्री सरोज का युवावस्था में जाना। और फिर भी इतना स्तरीय लेखन ... सचमुच तुम 'महाप्राण' थे। नमन तुम्हे ।

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