रोचक कहानियाँ Cover Image

#happyrepublicday2021 🇮🇳

Jai Hind ✊

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कर्ज़ वाली लक्ष्मी ना कोई विदा करे, ना ही कोई स्वीकार करे।

*आज का प्रेरक प्रसंग*
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एक रिटायर्ड सीनियर अधिकारी को अपने ऑफिस जाने की जिज्ञासा हुई। वह अपने मन में बड़े-बड़े सपने लेकर जैसे कि :- मैं जब ऑफिस पहुंचूँगा तो सभी अधिकारी एवं कर्मचारी मेरा बढ़-चढ़कर स्वागत करेंगे, तत्काल अच्छा नाश्ता मंगाया जाएगा, आदि आदि।

ऐसा सोचते सोचते वह अपने वाहन से ऑफिस जा रहा था। जैसे ही गेट पर पहुंचा तो गार्ड ने रोका और कहा कि 'आप अंदर जाने से पहले गाड़ी बाहर ही साइड पर लगा दें'। इस पर अधिकारी भौंचक्का रह गया, और कहा कि 'अरे! तुम जानते नहीं हो, मैं यहां का चीफ ऑफ ऑफिसर रहा हूं। गत वर्ष ही रिटायर हुआ हूं'। इस पर गार्ड बोला- 'तब थे, अब नहीं हो। गाड़ी गेट के अंदर नहीं जाएगी'। अधिकारी बहुत नाराज हुआ और वहां के अधिकारी को फोन कर गेट पर बुलाया। अधिकारी गेट पर आया और रिटायर्ड चीफ ऑफिसर को अंदर ले गया।

गाड़ी भी अंदर करवाई और अपने चेंबर में जाते ही वह चेयर पर बैठ गया और चपरासी से कहा- 'साहब को जो भी कार्य हो, संबंधित कर्मचारी के पास ले जाकर बता दो'। चपरासी साहब को ले गया और संबंधित कर्मचारी के काउंटर पर छोड़ आया। चीफ साहब अवाक से खड़े सोचते रहे। कार्यालय आते समय जो सपने संजोए थे, वह चकनाचूर हो चुके थे। पद का घमंड धड़ाम हो चुका था। वह घर पर चले आए।


काफी सोचने के बाद उन्होंने अपनी डायरी में लिखा- एक विभाग के कर्मचारी शतरंज के मोहरों की तरह होते हैं। कोई राजा, कोई वजीर, कोई हाथी, घोड़ा, ऊंट तो कोई पैदल बनता है। खेलने के बाद सभी मोहरों को एक थैले में डालकर अलग रख दिया जाता है। खेलने के बाद उसके पद का कोई महत्व नहीं रह जाता है।


*अतः इंसान को अपने परिवार और समाज को नहीं भूलना चाहिए। कितने भी ऊंचे पद पर पहुंच जाओ लौटकर अपने ही समाज में आना है ,अत:अपनी जड़ें व धरातलीय आधार स्तम्भ को मजबूत रखें न कि हवाई स्वप्नों में आकर अपनी हकीकत को भूला दें ।*।

किसी मंदिर में एक पंडित रहते थे। पंडित के पास 1गधा भी था

सैकड़ों भक्त उस मंदिर पर आकर दान-दक्षिणा चढ़ाते थे❗

उन भक्तों में एक बंजारा भी था।
वह बहुत गरीब था ,
फिर भी, नियमानुसार आकर माथा टेकता,

पंडित की सेवा करता,
और
फिर अपने काम पर जाता,

उसका कपड़े का व्यवसाय था,
कपड़ों की भारी पोटली कंधों पर लिए सुबह से लेकर शाम तक गलियों में फेरी लगाता,
कपड़े बेचता❗

एक दिन उस पंडित को उस
पर दया आ गई,
उसने अपना गधा उसे भेंट कर दिया❗

अब तो बंजारे की आधी समस्याएं हल हो गईं।

वह सारे कपड़े गधे पर लादता और जब थक जाता
तो
खुद भी गधे पर बैठ जाता

इसी बीच गधा भी अपने नये मालीक से काफी घूलमील गया था

यूं ही कुछ महीने बीत गए,,
एक दिन गधे की मृत्यु हो गई❗

बंजारा बहुत दुखी हुआ,
उसने गधे को उचित स्थान पर दफनाया,
और उसकी समाधी बनाई
और
फूट-फूट कर रोने लगा❗

समीप से जा रहे किसी व्यक्ति ने
जब यह दृश्य देखा,
तो सोचा
जरूर किसी संत की समाधी होगी❗
तभी यह
बंजारा यहां बैठकर अपना दुख रो रहा है❗

यह सोचकर उस व्यक्ति ने समाधी पर
माथा टेका और अपनी मनोकामना हेतु वहां प्रार्थना की कुछ पैसे चढ़ाकर वहां से चला गया❗

कुछ दिनों के उपरांत ही उस
व्यक्ति की कामना पूर्ण हो गई❗

उसने
खुशी के मारे सारे गांव में
डंका बजाया कि अमुक स्थान पर एक पूर्ण संत की समाधी है❗

वहां जाकर जो मनोकामना मांगो वह पूर्ण होती है।
मनचाही मुरादे बख्शी जाती हैं

उस दिन से उस समाधी पर
भक्तों का तांता लगना शुरू हो गया❗

दूर-दराज से भक्त अपनी मनोकामना पूर्ण करने हेतु आने लगे।

बंजारे की तो चांदी हो गई,
बैठे-बैठे उसे कमाई
का साधन मिल गया था❗

और धीरे धीरे वह समाधी भी पूरी तरह से मंदिर का आकार ले चुकी थी❗

एक दिन वही पूराने पंडित
जिन्होंने बंजारे
को अपना गधा भेंट स्वरूप
दिया था वहां से गुजर रहे थे❗

उन्हें देखते ही बंजारे ने उनके चरण पकड़ लिए और बोला-
'आपके गधे ने
तो मेरी जिंदगी बना दी❗

जब तक जीवित था
तब तक मेरे रोजगार में मेरी मदद करता था
और
मरने के बाद
मेरी जीविका का साधन उसका मंदिर बन
गया है❗'

पंडित हंसते हुए बोले,
'बच्चा!
जिस मंदिर में
तू नित्य माथा टेकने आता था,
वह मंदीर इस गधे की मां का था❗'

बस ऐसे ही चल रहा है मेरा महान भारत ❗
Incredible India.
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“बुद्ध की बलि”

एक गाँव में यज्ञ हो रहा है, और गाँव का राजा, एक बकरे को चढ़ा रहा है। बुद्ध गाँव से गुज़रे हैं, वो वहाँ पहुँच गए। और उन्होंने उस राजा को कहा कि, “ये क्या कर रहे हैं? इस बकरे को चढ़ा रहे हैं, किसलिए?”
तो उसने कहा कि, “इसके चढ़ाने से बड़ा पुण्य होता है।”
तो बुद्ध ने कहा, “मुझे चढ़ा दो, तो और भी ज़्यादा पुण्य होगा।”
वो राजा थोड़ा डरा। बकरे को चढ़ाने में चढ़ाने में कोई हर्ज़ा नहीं, लेकिन बुद्ध को चढ़ाना! उसके भी हाथ-पैर कँपे।
और बुद्ध ने कहा कि, “अगर सच में ही कोई लाभ करना हो तो अपने को चढ़ा दो। बकरा चढ़ाने से क्या होगा?”

उस राजा ने कहा, “न, बकरे का कोई नुकसान नहीं है, स्वर्ग चला जाएगा।”
बुद्ध ने कहा, “ये बहुत ही अच्छा है, मैं स्वर्ग की तलाश कर रहा हूँ, तुम मुझे चढ़ा दो, तुम मुझे स्वर्ग भेज दो। और तुम अपने माता-पिता को क्यों नहीं भेजते स्वर्ग, और ख़ुद को क्यों रोके हुए हो? जब स्वर्ग जाने की ऐसी सरल, तुम्हें सुगम तरकीब मिल गई है, तो काट लो गर्दन। बकरे को बेचारे को क्यों भेज रहे हो, जो शायद जाना भी न चाहता हो स्वर्ग? बकरे को ख़ुद ही चुनने दो कहाँ उसे जाना है।”

उस राजा को समझ आई। उसे बुद्ध की बात ख़्याल में पड़ी। ये बडी सचोट बात थी।

आदमी ने सब चढ़ाया है... धन चढ़ाया, फूल चढ़ाए। फूल भी तुम्हारे नहीं... वो परमात्मा के हैं, वृक्षों पे चढ़े ही हुए थे। वृक्षों पर परमात्मा के चरणों में ही चढ़े थे। वृक्षों के ऊपर से उनको परमात्मा की यात्रा हो ही रही थी। वहीं तो जा रही थी वह सुगन्ध, और कहाँ जाती? तुमने उनको वृक्षों से तोड़के मुर्दा कर लिया और फिर मुर्दा फूलों को जाके मन्दिर में चढ़ा आए। और समझे कि बड़ा काम कर आए हो। कभी धूप-दीप जलाए, कि कभी जानवर चढ़ाए, कि कभी आदमी भी चढ़ा दिए! अपने को कब चढ़ाओगे? और जो अपने को चढ़ाता है, वही उसे पाता है।

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