राजनीतिक व्यंग्य Cover Image

नरेंद्र मोदी क्रिकेट स्टेडियम किसान आंदोलन की सबसे बड़ी जीत है, बस किसानों की नहीं

भारत के नेताओं की एक खूबी है। वे काम की जगह नाम के अमरत्व में विश्वास करते हैं। उन्हें पता है कि काम अमर नहीं होता है। वह नश्वर है। नाम अमर होता है। जब तक सूरज चाँद रहेगा तब तक। इसलिए भारत का नेता अपने नाम की एक डेडलाइन भी तय कर देता है। उसे चाह होती है कि उसके नाम पर योजना हो। परियोजना हो। किसी योजना को राष्ट्र को समर्पित करने से पहले किसी नाम को समर्पित करे। इस प्रक्रिया में वह अपने दल से महान नेताओं का चुनाव करता है। उन्हीं के नाम पर सड़कें बनवाता है। योजनाएँ लाँच करता है। शिलान्यास करता है। उद्घाटन करता है। वह नामजीवी बन जाता है। उसे पता है नाम ही जड़ है। नाम ही परिवर्तनशीलता है। नाम को ही बड़ा करना है। नाम को ही छोटा करना है। नाम का इस्तमाल तलवार की तरह भी होता है और हार की तरह भी।

एक ऐसे समाज में जब नब्बे दिनों से किसान कृषि क़ानूनों के विरोध के दौरान अंबानी और अड़ानी के नाम से भी नारे लगा रहे हैं, राहुल गांधी हम दो और हमारे दो के आरोप मढ़ रहे हैं, अमित शाह अहमदाबाद में एक क्रिकेट स्टेडियम का नाम नरेंद्र मोदी क्रिकेट स्टेडियम रख देते हैं। जिसके भीतर एक छोर का नाम रिलायंस एंड है और दूसरे छोर का अड़ानी एंड।
इस लिहाज़ से नरेंद्र मोदी क्रिकेट स्टेडियम शरद पवार के नाम से बने स्टेडियम या किसी दूसरे जीवित नेताओं के नाम पर बनी मूर्ति से थोड़ा अलग मामला बन जाता है। नाम रखने में कोई बड़ी बात नहीं लेकिन किस चीज़ का और किसके साथ नाम रखा गया है बात उसमें है।

नरेंद्र मोदी ने विपक्ष और उन्हें जवाब दिया है जो कहते हैं कि उनकी सरकार अड़ानी-अंबानी की दुकान है। आम तौर पर प्रधानमंत्री स्तर के नेता ऐसे आरोपों से लजाते सकुचाते हैं मगर कहा जा सकता है कि नरेंद्र मोदी ने खुलकर अपने जवाब का इज़हार किया है। आप सभी ने कई बार विपक्ष के राजनीतिक आरोपों में सुना होगा कि अड़ानी और अंबानी के खर्चे से फ़लाँ दल और उसकी सरकार चलती है। यह आरोप तो कांग्रेस पर भी लगता है। भारत के राजनीतिक हलकों में यह स्वीकृत-अस्वीकृत सच है। अब यह एक खुला प्रश्न है कि स्टेडियम के नामकरण से नरेंद्र मोदी ख़ुद इन आरोपों को हवा दे रहे हैं या सच साबित कर रहे हैं ?

सोशल मीडिया पर कई लोग भारत इंग्लैंड मैच के स्क्रीन शॉट लेकर बता रहे हैं कि एक छोर का नाम अंबानी एंड है और दूसरे का अड़ानी एंड है। वैसे एक छोर का नाम रिलायंस के नाम पर है लेकिन जनता रिलायंस को अंबानी ही कहती है। कमेंट्री में यह बात अनेक बार आएगी कि नरेंद्र मोदी स्टेडियम में रिलायंस छोर से गेंदबाज़ तैयार है और अड़ानी छोर से बल्लेबाज़। जनता से छिप कर अंबानी और अड़ानी से वित्तीय अमृत पीने वाले नेताओं को नरेंद्र मोदी ने चुनौती दी है। वे अपने संबंधों को सामने से जीते हैं। किसी प्रधानमंत्री ने अड़ानी और अंबानी को इतना सार्वजनिक मान नहीं दिया होगा। कल का दिन बेशुमार दौलत के मालिक अड़ानी और अंबानी के लिए वेलेंटाइन डे से कम ख़ुशनुमा नहीं रहा होगा। उन्होंने निवेश तो कई नेताओं में किए लेकिन ऐसा रिटर्न किसी ने न दिया होगा। नरेंद्र मोदी क्रिकेट स्टेडियम अडानी एंड और रिलायंस एंड के साथ आज करोड़ों घरों में पहुँच रहा है। हम दो हमारे दो अगर आरोप है तो आरोप ही सही!

राजनीति में नेता अपने प्रतीकों का चुनाव बहुत सावधानी से करते हैं। कई बार वह खुद विडंबनाओं को सामने रखता है और कई बार विडंबनाएं खुद सामने आ जाती हैं। इसी गांधीनगर में बिहार के कुख्यात नेता साधु यादव से नरेंद्र मोदी मिलते हैं। अगस्त 2013 की बात है। आज भी हर दिन उनकी पार्टी बिहार में साधु और सुभाष का नाम लेकर अराजकता की याद दिलाती है। मुलाक़ात के समय साधु यादव कांग्रेस में थे। साधु ने बताया कि शिष्टाचार की मुलाक़ात 40-50 मिनट की थी! स्टेडियम का नाम एक जवाब है कि नरेंद्र मोदी बहुत परवाह नहीं करते हैं कि विपक्ष उन्हें अड़ानी और अंबानी का पॉकेट लीडर बताता है। मेरी राय में यह स्टेडियम किसान आंदोलन की सबसे बड़ी जीत है। बस यह किसानों की जीत नहीं है। नरेंद्र मोदी, अड़ानी और अंबानी की जीत है। किसान आंदोलन ने अगर गाँव-गाँव घर-घर पहुँचा दिया कि सरकार अड़ानी-अंबानी को सब बेच देगी, नरेंद्र मोदी स्टेडियम भी क्रिकेट के ज़रिए उन्हीं गाँव घरों में अड़ानी और अंबानी का नाम लेकर पहुँचेगा। जनता जो समझे।

राहुल गांधी वो मिसाइल है।
जिसे बार बार ईंधन भरकर लांच तो बीजेपी के लिए किया जाता है
लेकिन गिरती हमेशा काँग्रेस पर ही है ।
🙄🙄🤔🤔

सिर्फ ये पीला हिस्सा भारत के पास है, जिसे बचाने के लिए 1947 से स्थाई रूप से सेना अपना बलिदान दे रही है l

बाकी हरा और लाल हिस्सा तो कांग्रेस पार्टी के नेता और स्वयं को भारत रत्न देनेवाले देश के प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू ने 1947 और 1962 को, पाकिस्तान और चीन को खुशी खुशी सौप कर, अपने अदम्य साहस एवं वीरता का परिचय दिया था।

इतना ही नही 1971 में जब हम पाकिस्तानियों से जीत कर, उनके 90000 सैनिकों को बंदी बनाये थे, तब भी कोई कोशिश नही की गई POK को वापस लेने की।

उसके बाद भी इतने साल सत्ता में रहने वाली पार्टी ने कोई कोशिश नही की इन भूखंडों को वापस लेने की और आज यही लोग वर्तमान सरकार पर सवाल उठा रहे हैं।

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ये कोंग्रेसी पप्पू के साथ क्या जानबूझकर ऐसी हरकतें करते हैं, ताकि लोगो का मनोरंजन होता रहे??

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जब दिल्ली में बिजली फ्री है तो

सिलेंडर महंगा होने पर छाती क्यों पीट रहे हो
हीटर पर खाना बनाओ हीटर पे😝