देशी कल्चर Cover Image

घमंड किस बात का करें
आज मिट्टी के ऊपर
तो कल मिट्टी के नीचे।

किसान की मेहनत में ही
इस देश की किस्मत छिपी है

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यूरोप का एक देश है नार्वे ....

वहां कभी जाईयेगा तो यह सीन आम तौर पर पाईयेगा....

एक रेस्तरां है ...
उसके कैश काउंटर पर एक महिला आती है और कहती है -"5 Coffee, 1 Suspensio"..फिर वह पांच कॉफी के पैसे देती है और चार कप कॉफी ले जाती है ...

थोड़ी देर बाद ....
एक और आदमी आता है ,कहता है- "4 Lnch , 2 Suspension" ! वह चार Lunch का भुगतान करता है
और दो Lunch packets ले जाता है...

फिर एक और आता है ...आर्डर देता है - "10 Coffee , 6 Suspension" !! वह दस के लिए भुगतान करता है,
चार कॉफी ले जाता है...

थोड़ी देर बाद....
एक बूढ़ा आदमी जर्जर कपड़ों में काउंटर पर आकर पूछता है- "Any Suspended Coffee ??"

काउंटर-गर्ल मौजूद कहती है- "Yes !!"और एक कप गर्म कॉफी उसको दे देती है ...

कुछ देर बाद वैसे ही एक और दाढ़ी वाला आदमी अंदर आता है,पूछता है- "Any Suspended Lunch ??" तो काउंटर पर मौजूद व्यक्ति गर्म खाने का एक पार्सल और
पानी की एक बोतल उसको दे देता है ...

और यह क्रम ...एक ग्रुप द्वारा अधिक पेमेंट करने का और
दूसरे ग्रुप द्वारा बिना पेमेंट खान-पान ले जाने का दिन भर चलता रहता है ....

यानि ...अपनी "पहचान" न कराते हुए और किसी के चेहरे को "जाने बिना" भी अज्ञात गरीबों, जरुरतमन्दों की मदद करना...

यह है नार्वे नागरिकों की परंपरा !!!

और बताया जा रहा है कि यह "कल्चर" अब यूरोप के अन्य कई देशों में फैल ररहा है...

और हम ...???

अस्पतालों में एक केला,एक संतरा मरीजों को बांटेंगे...
सारे मिलकर अपनी पार्टी, अपने संगठन का ग्रुप फोटो खिंचाकर अखबार में छापेंगे !! सेल्फियों की बाढ़ लगा देंगे और सोशियल मीडिया पर वायरल करेंगे...!

है ना ???

हमने तो कोरोना काल में भी...(क्या सरकार, क्या हम-आप ) हर स्तर पर बैनर लगाकर दिया है बाजे-गाजे के साथ..कभी अखबार में छप कर, कभी टी.वी. पर भाषण दे-देकर !!!

है ना ???

या फिर ...भूखे बच्चे रेस्तरां के बाहर ललचाते हुए आपको खाते-पीते देखेंगे...और आप उनको कुछ देंगे भी तो लोगों को दिखाते हुए और याचक का मान भी चोट पहुँचाते हुए !!!

है ना ??

क्या भारत में भी ...इस प्रकार की खान-पान की
"Suspension" प्रथा का प्रारंभ हो सकता है ???

हमें भारत पर आज भी गर्व है की हमारे यहां भी ऐसे दानदाता हुए हैं जो दान देते समय अपनी नजरें संकोच से झुका लिया करते थे..!

अगर नार्वे की तरह यह आदर्श प्रथा हम भी शुरू करें -- कितना अच्छा होगा....

दानदाता को पता न हो कि दानग्रहीता कौन है और दानग्रहीता को पता न हो दानदाता कौन है...!

वर्तमान समय में नॉर्वे के अलावा विश्व में 7 और देशों में यह पहल हो चुकी है , पर भारत में अब भी लोग .....

यह अनुकरणीय पहल हो सकती है...🙏🙏🙏

अज्ञात

झुंड में तो ये टीडिया आवे

शेर तो एकलो ही आवे पिंपो बजावतो